प्रकृति ने जिनके शरीर में कोई कमी छोड़ दी उन्हें विकलांग कहकर उनके दुर्भाग्य के लिए प्रकृति के अन्याय को दोषी माना जाया है। लेकिन सच तो यह है की प्रकृति ने इनके साथ जितना बड़ा अन्याय किया उससे कहीं बड़ा अन्याय हमारा समाज करता है।
वे अपनी एक छमता खोकर भी शेष छमताओं से अपना भाग्य संवार सकते हैं लेकिन समाज उन्हें दया का पात्र बनाकर रखने पर मानो आमादा रहता है। उन्हें कमजोर और नकारा समझा जाता है।
परिवार और समाज का नजरिया विकलांगों के प्रति गैर जिम्मेदाराना होता है। उन्हें दरकिनार और शोषित किया जाता है।
सच तो यह है की विकलांग भी आम लोगों की तरह काम कर सकते हैं। सहायक उपकरणों और तकनीकी साधनों के बदौलत वे लगभग सभी प्रकार के कार्य कुशलता से कर सकते हैं।
विकलांग बच्चों को सीखने के लिए विशेष प्रकार के साधनों की जरुरत कुछ हद तक होती है। इनके लिए स्पेशल स्कूल होते हैं। जहाँ पर वे आसानी से सीख सकते हैं।
बस, जरुरत है समाज के सकारात्मक व्यवहार और सहयोग की। विकलांगों को सहानुभूति नही, समानुभूति की दरकार है। उन्हें उनके अधिकार चाहिए दया नही।
- अमितसिंह कुशवाह
( आप विकलांगता या विकलांगों के बारे में किसी प्रकार की कोई जानकारी चाहते हैं तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं।)
मोबाइल : 09300939758
Friday, July 17, 2009
Sunday, March 22, 2009
लोकसभा चुनाव : कहाँ है विकलांग
लोकसभा चुनाव में कई मुद्दों पर पर सत्ताधारी दल विकास की बात और विरोधी पार्टी सरकार की असफलता को जनता के सामने लाकर वोटर को अपनी ओर करने के लिए तत्पर हैं। इन सबके बीच समाज के एक वर्ग को हंसिये पर रखा जा रहा है। विकलांगों को ना सिर्फ अपने परिवार बल्कि समाज और सरकार की घोर उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। विकलांगो के कल्याण के लिए सरकार के पास कोई कारगर योजना नही है। चुनावों में कई मुद्दे उठाए जाते है लेकिन विकलांगों की कभी कोई बात नही करता। विकलांगों को कभी प्रत्यासी के रूप में चुनाव में नही उतारा जाता, आखिर क्यों ? शायद इसलिए की पार्टियों को विकलांगो में वोट बैंक नही दिखाई देता ? क्या कभी ऐसा भी होगा जब विकलांगों की सुध ली जयेगी ? उन्हें विकास के समान अधिकार कब मिलेंगे ये सारे सवाल ऐसे हैं जिनका जबाव किसी के पास नही है ?
- अमितसिंह कुशवाह
मो.: 093009-39758
Wednesday, November 19, 2008
बधिरता : एक चुनौती
श्रवण शक्ति या सुनने संबंधी विकलांगता (जिसमें बहरापन भी शामिल है) का अर्थ है सुनने में परेशानी होना यह स्थायी हो सकती है या फिर इसमें उतार चढाव भी आ सकता है। इससे बच्चे के शैक्षिक प्रदर्शन । उसकी भाषा और उसकी सुनने बोलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।यह विकलांगता विभिन्न स्तर की हो सकती है जिसमें बहुत कम, मध्यम, ज्यादा, बहुत ज्यादा या पूरी तरह भी हो सकती है। विकलांगता के स्तर की श्रेणी सुनने की शक्ति के नुकसान पर आधारित होती हैं। यह प्रत्येक कान में अलग भी हो सकती है या फिर दोनों कानों से कुछ भी सुनाई नहीं दे सकता है। अगर यह एक कान में होती है तो इसे यूनीलैट्रल और अगर दोनों कानों में होती है बाइलैट्ररल कहा जाता है।
विकलांगता जन्म से या फिर बाद में भी हो सकती है। अगर यह जन्मजात और दोनों कानों में होती है तो इससे सामान्य भाषा और बोलने के विकास में परेशानी होती है। जन्म के बाद यह विकलांगता जीवन के किसी भी समय धीरे धीरे या एकदम हो सकती है और इससे भी भाषा के विकास और बोलने में कठिनाई होती है। इस विकलांगता को आमतौर से तीन भागों भाषा में बांटा जाता है – प्रीलिंगुअल यानी भाषा के विकास और बोलने से पहले, पेरीलिंगुअल यानी भाषायी कौशलों को सीखने की प्रक्रिया तथा बोलेने की क्षमताओं के दौरान तथा पोस्टलिंगुअल अर्थात भाषायी विकास हासिल करने और बोलना सीखने के बाद पैदा हुई विकलांगता।
भारत में प्रतिदिन ५० से अधिक बच्चे बधिर पैदा होते है। प्रतिवर्ष लगभग २० हजार बधिर बच्चों की संख्या में इजाफा होता है बधिरता संबंधी सर्वेक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि लगभग १० प्रतिशत भारतीय किसी न किसी प्रकार की बधिरता के शिकार है। जन्मजात बधिरता का एक हद तक इलाज संभव है बशर्तें समय रहते इसका पता चल जाए। यदि बच्चे में बधिरता का संशय हो तो इसके लिए ऑडियों मेट्री में जांच कराई जानी चाहिए। आजकल ब्र्रेन इवोक्ड रेस्पोन्स ऑडियों मेट्री (बेरा) की सुविधा उपलब्ध है। इस जांच से नवजात शिशु ही नहीं, सात माह पश्र्चात गर्भस्थ शिशु में भी बधिरता का पता चल सकता है। ब्रेन इवोक्ड रेस्पान्स ऑडियों मेट्री द्वारा बच्चे की श्रवण क्षमता का आकलन कर बच्चे में उचित समय पर श्रवण मंत्रों से सुनने की क्षमता विकसित की जा सकती है। कोकलियर इम्पलांट शल्य चिकित्सा द्वारा बधिरता का सफलता पूर्वक इलाज किया जा सकता है। वयस्क व्यक्ति में बधिरता के प्रमुख कारणों में कान में मैल जमना, कान या मस्तिष्क में किसी प्रकार की चोट। बाहरी या अंदरूनी, जीवाणु एवं वाइरल संक्रमण तथा ध्वनि प्रदूषण प्रमुख है। आज बढता हुआ ध्वनि प्रदूषण, श्रवण क्षमता पर घातक प्रभाव पहुंचा रहा है। अत: ध्वनि प्रदूषण पर निंयत्रण बेहद आवश्यक है वृद्वावस्था में भी शने: शनै: श्रवण क्षमता का हास होता है।
भारत में प्रतिदिन ५० से अधिक बच्चे बधिर पैदा होते है। प्रतिवर्ष लगभग २० हजार बधिर बच्चों की संख्या में इजाफा होता है बधिरता संबंधी सर्वेक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि लगभग १० प्रतिशत भारतीय किसी न किसी प्रकार की बधिरता के शिकार है। जन्मजात बधिरता का एक हद तक इलाज संभव है बशर्तें समय रहते इसका पता चल जाए। यदि बच्चे में बधिरता का संशय हो तो इसके लिए ऑडियों मेट्री में जांच कराई जानी चाहिए। आजकल ब्र्रेन इवोक्ड रेस्पोन्स ऑडियों मेट्री (बेरा) की सुविधा उपलब्ध है। इस जांच से नवजात शिशु ही नहीं, सात माह पश्र्चात गर्भस्थ शिशु में भी बधिरता का पता चल सकता है। ब्रेन इवोक्ड रेस्पान्स ऑडियों मेट्री द्वारा बच्चे की श्रवण क्षमता का आकलन कर बच्चे में उचित समय पर श्रवण मंत्रों से सुनने की क्षमता विकसित की जा सकती है। कोकलियर इम्पलांट शल्य चिकित्सा द्वारा बधिरता का सफलता पूर्वक इलाज किया जा सकता है। वयस्क व्यक्ति में बधिरता के प्रमुख कारणों में कान में मैल जमना, कान या मस्तिष्क में किसी प्रकार की चोट। बाहरी या अंदरूनी, जीवाणु एवं वाइरल संक्रमण तथा ध्वनि प्रदूषण प्रमुख है। आज बढता हुआ ध्वनि प्रदूषण, श्रवण क्षमता पर घातक प्रभाव पहुंचा रहा है। अत: ध्वनि प्रदूषण पर निंयत्रण बेहद आवश्यक है वृद्वावस्था में भी शने: शनै: श्रवण क्षमता का हास होता है।
किसी भी प्रकार के बच्चे या वयस्क के लिए क्या-क्या हों सकता है इसकी जानकारी के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
यह एक प्रयास है ताकि आपको विकलांग व्यक्ति के बेहतर जीवन के रास्ते की सही जानकारी मिल सके।
आप कभी भी हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करें - 093009-३९७५८
- अमितसिंह कुशवाह
Sunday, November 16, 2008
क्या आपके आसपास कोई विकलांग है?
प्रकृति ने जिनके शरीर में कोई कमी छोड़ दी उन्हें विकलांग कहकर प्रकृति के अन्याय को दोषी माना जाता है। विकलांग व्यक्ति अपनी बची हुई शक्तियों का उपयोग कर अपना जीवन सँवार सकते हैं. बस, उन्हे जरूरत है आपके सहयोग की.क्या आपके आसपास कोई ऐसा बच्चा है?
* क्या बच्चा हल्की या दूर से की गई आवाज को सुन पाता है?
* जब आप उससे बात करते हैं तो क्या वह हमेशा आपके चेहरे की ओर देखना चाहता है या देखता है? * क्या उसकी आवाज अस्वाभाविक या दूसरे बच्चों से अलग है?
* क्या तीन माह की आयु तक उसका बोलना शुरू नहीं हुआ है या फिर वह अस्पष्ट बोलता है?
* कुछ सीखने, समझने, निर्णय लेने में उसे देर लगती है?
* क्या उसकी आँखों तथा हाथों में समन्वय की कमी है।
* क्या वह आँखें या कान खुजलाता रहता है?
* क्या उसकी आँखें या कान बहते रहते हैं?
* क्या ज्यादातर वह एक आँख या एक कान इस्तेमाल करता है?
*क्या कोई भी चीज देखने के लिए बच्चा वह चीज आँख के नजदीक पकड़ता है?
*क्या उसे कूबड़ है?
*उसके हाथ-पैर नहीं हैं या शक्तिहीन, टेढ़े अलग हैं या सामान्य बच्चे से भिन्न हैं?
अगर इसमें से एक भी सवाल का जवाब हाँ में है, तो वह बच्चा विकलांग तो सकता है।
किसी भी प्रकार के विकलांग बच्चे या वयस्क के लिए क्या-क्या हों सकता है इसकी जानकारी के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
यह एक प्रयास है ताकि आपको विकलांग व्यक्ति के बेहतर जीवन के रास्ते की सही जानकारी मिल सके।
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- अमितसिंह कुशवाह
Wednesday, November 12, 2008
जल्द ही पता लगा लें बच्चों में विकलांगता का...
जन्म से ही बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान देकर बच्चे को विकलांगता से बचाया जा सकता है। बच्चा जब इस दुनिया में आता है तो उसके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे परिजनों और रिश्तेदारों के लिए ढेर सारी खुशियाँ लेकर आता है। लेकिन कुछ परिवारों में ये खुशियाँ ज्यादा समय तक नहीं टिक पाती हैं। आनुवांशिक कारणों, जन्म के पहले या जन्म के समय हुई किसी भी प्रकार की अनियमितता, शारीरिक या मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न होने से बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांगता का शिकार हो जाता है। ऐसी स्थिति में अभिभावकों के सारे सपने ताश के पत्तों की तरह धराशायी हो जाते हैं और सामने होती है बच्चे के भविष्य से जुड़ी हुई ढेर सारी चिंताएँ। इसलिए जन्म से ही बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान देकर बच्चे को विकलांगता से बचाया जा सकता है। यदि बाल्यकाल में विकलांगता की पहचान हो जाए तो बच्चे में बची हुई क्षमताओं का उपयोग कर उसे समर्थ बनाने में आसानी होती है। बच्चे में विकास के क्या मानदंड हैं तथा उनमें कमी होने पर क्या किया जाना चाहिए। इसके लिए जन्म से ही बच्चे की गतिविधियों को अभिभावक ध्यान से देखें जिससे बच्चे का पूर्ण विकास समय पर हो सके। क्या आपका बच्चा यह सामान्य हरकतें करता है?
दृष्टि का विकास
* जन्म से 3 माह की आयु तक-
- बच्चे के सामने कोई भी चीज घुमाएँ तो बच्चा आँखें घुमाता है या उसे पकड़ना चाहता है।
- अपने हाथों के साथ खेलता है।
* 3 से 6 माह की आयु तक-
- भोजन ग्रहण करते या खेलते समय माँ की आँखों से आँखें मिलाता है।
- आसपास की चीजों को, उसके आसपास में ही रही हलचल को ध्यान से देखता है।
* 18 माह से अधिक-
- चित्रों की रंगीन किताबें, खिलौने आदि को रुचि से देखता है।
- गेंद फेंकने, पकड़ने, पीछे दौड़ने की कोशिश करता है।
शारीरिक विकास
* जन्म से 3 माह की आयु तक-
- परिचित लोगों को देखकर मुस्कुराता है।
* 3 से 6 माह तक की आयु तक-
- अपनी गर्दन उठाकर स्थिर रख सकता है।
* 6 से 9 माह तक की आयु-
- बिना सहायता से बैठ सकता है।
* 9 से 18 माह तक की आयु-
- पहले सहायता से, फिर बिना सहायता से खड़ा रहता है।
- चलना शुरू करता है।
* 18 माह से अधिक-
- अपने आप चलने लगता है।
- अपने आप खाने-पीने लगता है।
सुनने की क्षमता का विकास
* जन्म से 3 माह तक की आयु तक-
- सोया हुआ बच्चा जोर की आवाज से जागता है।
* 3 से 6 माह तक की आयु तक-
- वह माँ की आवाज पहचानता है।
- बात करने पर बच्चा मुस्कुराता है।
* 6 से 9 माह तक की आयु-
- अच्छी और नई आवाज सुनना उसे अच्छा लगता है।
- आवाज की तरफ सिर घुमाता है।
* 9 से 18 माह तक की आयु-
- नहीं, रुको। जैसे शब्दों को समझता है।
- मुँह खोलो, पंखा दिखाओ जैसे शब्दों पर प्रतिक्रिया करता है।
* 6 से 9 माह तक की आयु-
- खिलौनों, वस्तुओं व परिवारजनों के बीच होने वाले अंतर को पहचानना शुरू कर देता है।
- छोटी वस्तुएँ खिलौने उठाने लगता है।
* 9 से 18 माह तक की आयु-
- बिना टकराए घर में आसपास चलने लगता है।
- थोड़ी दूरी पर रखी हुई चीज पकड़ सकता है।
- भाषा की समझ तेजी से बढ़ती है।
बोलने की क्षमता का विकास-
* जन्म से 3 माह की आयु तक-
- मुँह से ग...ग... ग...जैसी आवाज निकालकर आनंद लेता है।
* 3 से 6 माह की आयु तक-
- दा...दा...दा... ऐसी आवाज लगातार निकालता रहता है।
- उसके साथ बातें करने पर प्रतिक्रिया दर्शाता है।
* 6 से 9 माह तक की आयु-
- दूसरों की आवाज की नकल करने की कोशिश करता है।
- वह खुश है या गुस्से में है यह उसकी आवाज से पता चलने लगता है।
* 9 से 18 माह की आयु-
- किसी का ध्यान आकर्षित करने के लिए आवाज का इस्तेमाल करता है।
- सैकड़ों अर्थपूर्ण शब्द बोलता है।
* 18 माह से अधिक-
- बहुत बोलने लगता है।
- छोटे-छोटे वाक्य बोलने लगता है।
ध्यान दें-
अगर आपको लगता है कि बच्चे का विकास ऊपर दिए हुए विकास के मानकों से मेल नहीं करता, तो उसे तुरंत जाँच की आवश्यकता है। हर वह बच्चा जिसकी जाँच की जाती है विकलांग नहीं पाया जाता है। अगर किसी बच्चे का विकास अन्य बच्चों के विकास की तुलना में कम हुआ है तो उसके विकलांग होने की संभावना जरूर होती है।
इन सवालों के जवाब खोजें-
* क्या बच्चा हल्की या दूर से की गई आवाज को सुन पाता है? * जब आप उससे बात करते हैं तो क्या वह हमेशा आपके चेहरे की ओर देखना चाहता है या देखता है? * क्या उसकी आवाज अस्वाभाविक या दूसरे बच्चों से अलग है? * क्या तीन माह की आयु तक उसका बोलना शुरू नहीं हुआ है या फिर वह अस्पष्ट बोलता है? * कुछ सीखने, समझने, निर्णय लेने में उसे देर लगती है? * क्या उसकी आँखों तथा हाथों में समन्वय की कमी है। * क्या वह आँखें या कान खुजलाता रहता है? * क्या उसकी आँखें या कान बहते रहते हैं? * क्या ज्यादातर वह एक आँख या एक कान इस्तेमाल करता है? *क्या कोई भी चीज देखने के लिए बच्चा वह चीज आँख के नजदीक पकड़ता है? *क्या उसे कूबड़ है? *उसके हाथ-पैर नहीं हैं या शक्तिहीन, टेढ़े अलग हैं या सामान्य बच्चे से भिन्न हैं?
अगर इसमें से एक भी सवाल का जवाब हाँ में है, तो बच्चे को शीघ्र जाँच की जरूरत है। उसे विशेषज्ञ, डॉक्टर जिला विकलांग पुनर्वास केंद्र सरकारी या गैर सरकारी अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र ले जाएँ...! तुरंत!!
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